श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 205: धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाना और पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेजनेका प्रस्ताव करना  » 
 
 
अध्याय 205: धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाना और पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेजनेका प्रस्ताव करना
 
श्लोक 1:  धृतराष्ट्र बोले- विदुर! शान्तनुपुत्र भीष्म विद्वान् हैं और भगवान द्रोणाचार्य ऋषि हैं। अतः उनकी बातें अत्यन्त कल्याणकारी हैं। आप जो कुछ मुझसे कह रहे हैं, वह भी सत्य है॥ 1॥
 
श्लोक 2:  जैसे कुन्ती के वीर और पराक्रमी पुत्र पाण्डु के पुत्र हैं, वैसे ही धर्म की दृष्टि से वे सब मेरे भी पुत्र हैं - इसमें कोई संदेह नहीं है ॥2॥
 
श्लोक 3:  जैसे यह राज्य मेरे पुत्रों का राज्य कहा जाता है, वैसे ही यह पाण्डुपुत्रों का भी राज्य है - इसमें भी कोई संदेह नहीं है ॥3॥
 
श्लोक 4:  भरतवंशी विदुर! अब तुम जाओ और इन पाण्डवों को उनकी माता कुन्ती और देवतुल्य वर श्रीकृष्ण सहित आतिथ्यपूर्वक ले आओ॥4॥
 
श्लोक 5:  यह सौभाग्य की बात है कि कुंती के वे पुत्र जीवित हैं। यह सौभाग्य की बात है कि कुंती भी जीवित है और यह भी महान सौभाग्य की बात है कि उन महान योद्धाओं ने द्रौपदी की पुत्री को प्राप्त किया है।
 
श्लोक 6:  हे महात्मन! सौभाग्य से हम सब लोग उन्नति कर रहे हैं। सौभाग्य से ही पापी पुरोचन शांत हो गया है और सौभाग्य से ही मेरा महान दुःख समाप्त हो गया है।॥6॥
 
श्लोक 7-8:  वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय! तत्पश्चात् धृतराष्ट्र की आज्ञा से विदुरजी द्रौपदी, पाण्डवों तथा राजा यज्ञसेन के लिए नाना प्रकार की सम्पत्ति तथा रत्नों की भेंट लेकर राजा द्रुपद तथा पाण्डवों के पास गए।
 
श्लोक 9:  राजन! वहाँ पहुँचकर समस्त शास्त्रों के ज्ञाता और धर्म के विशेषज्ञ विदुर ने न्याय की नीति के अनुसार ज्येष्ठ और कनिष्ठ के क्रम से द्रुपद आदि को गले लगाया और हृदय से उनका अभिवादन किया।
 
श्लोक 10:  राजा द्रुपद ने भी धर्मानुसार विदुरजी का सत्कार किया। फिर वे दोनों विधिपूर्वक एक-दूसरे का कुशल-समाचार पूछने और कहने लगे॥ 10॥
 
श्लोक 11:  विदुरजी ने भी वहाँ पाण्डवों और वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण को देखा और स्नेहपूर्वक उन्हें गले लगाकर उन सबका कुशल-क्षेम पूछा॥11॥
 
श्लोक 12-14:  उन्होंने भी धीरे-धीरे अत्यंत बुद्धिमान विदुरजी का आदर किया। तत्पश्चात, राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा से विदुरजी ने बार-बार प्रेमपूर्वक युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डुपुत्रों से उनका कुशल-क्षेम पूछा। हे जनमेजय! तत्पश्चात विदुरजी ने कौरवों द्वारा दिए गए विभिन्न प्रकार के रत्न और धन पाण्डवपुत्रों, कुन्ती, द्रौपदी और द्रुपद को भेंट किए।
 
श्लोक 15:  अपार बुद्धि वाले विदुरजी पाण्डवों और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति विनीत भाव से बोले- 15॥
 
श्लोक 16-17:  विदुर बोले - हे राजन! आप अपने मन्त्रियों और पुत्रों सहित मेरी बात सुनिए। राजा धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों, मन्त्रियों और बन्धु-बान्धवों सहित बड़ी प्रसन्नता से बार-बार आपका कुशल-क्षेम पूछा है। राजन! वे आपके साथ हुए इस सम्बन्ध से अत्यन्त प्रसन्न हैं।॥16-17॥
 
श्लोक 18:  इसी प्रकार शान्तनुपुत्र महाज्ञानी भीष्मजी भी समस्त कौरवों के साथ मिलकर सब प्रकार से आपका कुशल-क्षेम पूछते हैं॥18॥
 
श्लोक 19:  आपके प्रिय मित्र परम बुद्धिमान भरद्वाजनंदन द्रोणाचार्य भी आपको (ध्यानपूर्वक) गले लगाकर आपका कुशल-क्षेम पूछ रहे हैं॥ 19॥
 
श्लोक 20:  पांचाल नरेश! राजा धृतराष्ट्र आपके सम्बन्धी होने पर स्वयं को धन्य मानते हैं। यही स्थिति समस्त कौरवों की है।
 
श्लोक 21:  यज्ञसेन! राज्य प्राप्ति से भी उसे उतना सुख नहीं हुआ जितना आपके साथ सम्बन्ध करने के सौभाग्य से हुआ॥ 21॥
 
श्लोक 22:  यह जानकर आप पाण्डवों को हस्तिनापुर भेज दीजिए। समस्त कुरुवंश पाण्डवों को देखने और उनसे मिलने के लिए अत्यन्त अधीर है॥22॥
 
श्लोक 23:  वे लम्बे समय से विदेशी भूमि पर रह रहे थे, इसलिए पांडव और कुंती सहित श्रेष्ठ पुरुष अपने गृहनगर को देखने के लिए उत्सुक होंगे।
 
श्लोक 24:  कौरव वंश की सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ, हमारे हस्तिनापुर नगर की प्रजा तथा पूरा राष्ट्र पांचाल राजकुमारी कृष्ण के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहा है।
 
श्लोक 25:  अतः आप कृपा करके पाण्डवों को उनकी पत्नियों सहित हस्तिनापुर के लिए तुरंत प्रस्थान करने की अनुमति प्रदान करें। इस विषय में मेरी यही राय है।
 
श्लोक 26:  महाराज! जब आप महाबली पाण्डवों को प्रस्थान की अनुमति दे देंगे, तब मैं यहाँ से एक तीव्रगामी दूत राजा धृतराष्ट्र के पास भेजकर यह संदेशा पहुँचा दूँगा कि कुन्ती और कृष्ण सहित समस्त पाण्डव हस्तिनापुर आएँ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)