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mahabharat 1.204.4: महाराज! बहुत सोचने पर भी मुझे आपके किसी परम मित्र में ऐसा कोई नहीं दिखाई देता जो इन दोनों वीर महापुरुषों से अधिक बुद्धिमान या विचारशक्ति वाला हो।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.204: विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 204: विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.204.4 
चिन्तयंश्च न पश्यामि राजंस्तव सुहृत्तमम्।
आभ्यां पुरुषसिंहाभ्यां यो वा स्यात् प्रज्ञयाधिक:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! बहुत सोचने पर भी मुझे आपके किसी परम मित्र में ऐसा कोई नहीं दिखाई देता जो इन दोनों वीर महापुरुषों से अधिक बुद्धिमान या विचारशक्ति वाला हो।॥4॥
 
Maharaj! Even after thinking a lot, I do not see any of your best friends who are greater in intelligence or thinking power than these two brave great men. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)