आप्लुत्याकाशगङ्गायां देहं त्यक्त्वा स मानुषम्।
स्वधर्मनिर्जितं स्थानं स्वर्गे प्राप्य स धर्मराट्॥ ३७५॥
मुमुदे पूजित: सर्वै: सेन्द्रै: सुरगणै: सह।
एतदष्टादशं पर्व प्रोक्तं व्यासेन धीमता॥ ३७६॥
अनुवाद
तत्पश्चात् धर्मराज ने आकाशमण्डल में गोता लगाकर अपना मानव शरीर त्याग दिया और अपने धर्म के द्वारा अर्जित स्वर्गलोक में उत्तम स्थान प्राप्त करके इन्द्र आदि देवताओं से सम्मानित होकर उनके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार बुद्धिमान व्यासजी ने इस अठारहवें पर्व को कहा है ॥375-376॥
After this, Dharamraj dived into the galaxy and left his human body and after getting the best place in the heavenly world earned by his dharma, he started living happily with Indra and the gods, getting honored by them. This is how the wise Vyasji has called this eighteenth festival. 375-376॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥