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mahabharat 1.2.370-374: उसके बाद स्वर्गारोहण दिवस के विषय में जानना चाहिए। जो दिव्य कथाओं और अलौकिकता से परिपूर्ण है। उसमें वर्णन है कि युधिष्ठिर को ले जाने के लिए स्वर्ग से एक दिव्य रथ आया, परंतु महाज्ञानी धर्मराज युधिष्ठिर ने दया करके अपने साथ आए कुत्ते को छोड़कर अकेले उस पर सवार होना स्वीकार नहीं किया। महात्मा युधिष्ठिर की धर्म में अटल स्थिति जानकर कुत्ते ने अपना मायावी रूप त्याग दिया और अब वह सच्चे धर्म के रूप में स्थित हो गया। युधिष्ठिर धर्म के साथ स्वर्ग गए। वहाँ देवदूत ने उन्हें नरक की अपार यातनाएँ दिखाईं। धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों की करुण पुकार सुन ली थी। वे सभी यमराज की आज्ञा से रहते थे और वहाँ नरक में यातनाएँ भोगते थे। उसके बाद धर्मराज और देवराज ने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर को उनके भाइयों को प्राप्त हुई वास्तविक मुक्ति दिखाई।   |   mahabharat अध्याय 1.2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 370-374
 
 
श्लोक  1.2.370-374 
स्वर्गपर्व ततो ज्ञेयं दिव्यं यत् तदमानुषम्।
प्राप्तं दैवरथं स्वर्गान्नेष्टवान् यत्र धर्मराट्॥ ३७०॥
आरोढुं सुमहाप्राज्ञ आनृशंस्याच्छुना विना।
तामस्याविचलां ज्ञात्वा स्थितिं धर्मे महात्मन:॥ ३७१॥
श्वरूपं यत्र तत् त्यक्त्वा धर्मेणासौ समन्वित:।
स्वर्गं प्राप्त: स च तथा यातना विपुला भृशम्॥ ३७२॥
देवदूतेन नरकं यत्र व्याजेन दर्शितम्।
शुश्राव यत्र धर्मात्मा भ्रातॄणां करुणा गिर:॥ ३७३॥
निदेशे वर्तमानानां देशे तत्रैव वर्तताम्।
अनुदर्शितश्च धर्मेण देवराजेन पाण्डव:॥ ३७४॥
 
 
अनुवाद
उसके बाद स्वर्गारोहण दिवस के विषय में जानना चाहिए। जो दिव्य कथाओं और अलौकिकता से परिपूर्ण है। उसमें वर्णन है कि युधिष्ठिर को ले जाने के लिए स्वर्ग से एक दिव्य रथ आया, परंतु महाज्ञानी धर्मराज युधिष्ठिर ने दया करके अपने साथ आए कुत्ते को छोड़कर अकेले उस पर सवार होना स्वीकार नहीं किया। महात्मा युधिष्ठिर की धर्म में अटल स्थिति जानकर कुत्ते ने अपना मायावी रूप त्याग दिया और अब वह सच्चे धर्म के रूप में स्थित हो गया। युधिष्ठिर धर्म के साथ स्वर्ग गए। वहाँ देवदूत ने उन्हें नरक की अपार यातनाएँ दिखाईं। धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों की करुण पुकार सुन ली थी। वे सभी यमराज की आज्ञा से रहते थे और वहाँ नरक में यातनाएँ भोगते थे। उसके बाद धर्मराज और देवराज ने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर को उनके भाइयों को प्राप्त हुई वास्तविक मुक्ति दिखाई।
 
After that one should know about the Ascension Day. Which is full of divine stories and supernatural. It is described in it that a divine chariot came from heaven to take Yudhishthir, but the great wise Dharmaraja Yudhishthir out of pity did not accept to ride on it alone, leaving the dog that came with him. Knowing Mahatma Yudhishthira's unshakable position in religion, the dog abandoned its illusory form and now it became established in the form of true religion. Yudhishthir went to heaven with Dharma. There the angel showed him the immense tortures of hell. The righteous Yudhishthir had heard the compassionate cry of his brothers. All of them lived under the orders of Yamraj and suffered torture there in hell. After that Dharmaraj and Devraj showed Pandunandan Yudhishthir the actual salvation that his brothers had attained. 370-374॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)