श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 225-226
 
 
श्लोक  1.2.225-226 
वैचित्रवीर्यस्य वच: समादाय पुरोधस:।
तथेन्द्रविजयं चापि यानं चैव पुरोधस:॥ २२५॥
संजयं प्रेषयामास शमार्थी पाण्डवान् प्रति।
यत्र दूतं महाराजो धृतराष्ट्र: प्रतापवान्॥ २२६॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र ने पाण्डवों के पुरोहित के इन्द्र की विजय के विषय में कहे हुए वचनों को आदरपूर्वक सुनकर उनके आगमन का औचित्य स्वीकार किया। तत्पश्चात् परम प्रतापी राजा धृतराष्ट्र ने भी शांति की इच्छा से संजय को पाण्डवों के पास दूत बनाकर भेजा। 225-226॥
 
Dhritarashtra, listening respectfully to the words of the priest of Pandavas regarding Indra's victory, accepted the propriety of his arrival. After that, the most glorious King Dhritarashtra also sent Sanjay as a messenger to the Pandavas, desiring peace. 225-226॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)