श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 222-224
 
 
श्लोक  1.2.222-224 
मद्रराजं च राजानमायान्तं पाण्डवान् प्रति।
उपहारैर्वञ्चयित्वा वर्त्मन्येव सुयोधन:॥ २२२॥
वरदं तं वरं वव्रे साहाय्यं क्रियतां मम।
शल्यस्तस्मै प्रतिश्रुत्य जगामोद्दिश्य पाण्डवान्॥ २२३॥
शान्तिपूर्वं चाकथयद् यत्रेन्द्रविजयं नृप:।
पुरोहितप्रेषणं च पाण्डवै: कौरवान् प्रति॥ २२४॥
 
 
अनुवाद
मद्र देश के अधिपति राजा शल्य पाण्डवों की ओर से युद्ध करने आ रहे थे, किन्तु दुर्योधन ने मार्ग में उन्हें धोखे से उपहार देकर प्रसन्न कर लिया और वरदाता राजा से यह वर माँगा कि 'कृपया मेरी सहायता कीजिए।' शल्य ने दुर्योधन की सहायता करने का वचन दिया। इसके बाद वे पाण्डवों के पास गए और उन्हें बड़ी शांतिपूर्वक सब कुछ समझाया। राजा ने इस प्रसंग में इन्द्र की विजय का वृत्तांत भी सुनाया। पाण्डवों ने अपने पुरोहित को कौरवों के पास भेजा॥222-224॥
 
King Shalya, the ruler of Madra country, was coming to fight on the side of the Pandavas, but Duryodhan deceived him with gifts on the way and pleased him and asked this boon from the boon-giving king that 'Please help me.' Shalya promised to help Duryodhan. After this he went to the Pandavas and explained everything very calmly. The king also narrated the story of Indra's victory in this context. The Pandavas sent their priest to the Kauravas.॥222-224॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)