श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 174-176
 
 
श्लोक  1.2.174-176 
अष्टावक्रीयमत्रैव विवादो यत्र बन्दिना।
अष्टावक्रस्य विप्रर्षेर्जनकस्याध्वरेऽभवत्॥ १७४॥
नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च।
पराजितो यत्र बन्दी विवादेन महात्मना॥ १७५॥
विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लब्धवानृषि:।
यवक्रीतस्य चाख्यानं रैभ्यस्य च महात्मन:।
गन्धमादनयात्रा च वासो नारायणाश्रमे॥ १७६॥
 
 
अनुवाद
इस पर्व में अष्टावक्र का चरित्र भी है। जिसमें जनक के यज्ञ में ब्रह्मर्षि अष्टावक्र का बंदी के साथ शास्त्रार्थ का वर्णन है। वे बंदी वरुण के पुत्र थे और नाविकों में प्रमुख थे। महात्मा अष्टावक्र ने उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित किया था। महर्षि अष्टावक्र ने बंदी को हराकर समुद्र में फेंके गए उसके पिता को पुनः प्राप्त किया था। इसके बाद यवक्रीत और महात्मा रैभ्य का उपाख्यान है। तत्पश्चात पाण्डवों की गन्धमादन यात्रा और नारायणाश्रम में उनके निवास का वर्णन है। 174—176॥
 
There is also a character of Ashtavakra in this festival. In which there is a description of Brahmarishi Ashtavakra's Shastrarth in Janak's Yagya with Bandi. He was the son of Bandi Varuna and was the chief among the sailors. Mahatma Ashtavakra defeated him in a debate. Maharishi Ashtavakra defeated the prisoner and retrieved his father who had been thrown into the sea. After this there is the anecdote of Yavakrita and Mahatma Raibhya. Thereafter, there is a description of the Pandavas' journey to Gandhamadana and their residence in Narayana Ashram. 174—176॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)