श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  1.2.137 
यत्रास्य मन्युरुद्‍भूतो येन द्यूतमकारयत्।
यत्र धर्मसुतं द्यूते शकुनि: कितवोऽजयत्॥ १३७॥
 
 
अनुवाद
उस उपहास से दुर्योधन के हृदय में क्रोध की अग्नि प्रज्वलित हो उठी। परिणामस्वरूप उसने द्यूतक्रीड़ा की योजना बनाई। इसी द्यूतक्रीड़ा में धूर्त शकुनि ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर को पराजित कर दिया।
 
Due to that mockery, the fire of anger ignited in Duryodhan's heart. Due to which he planned a game of gambling. In this very game, the cunning Shakuni defeated Dharmaputra Yudhishthir.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)