श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 198: कुन्तीका द्रौपदीको उपदेश और आशीर्वाद तथा भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंके लिये उपहार भेजना  »  श्लोक 13-15
 
 
श्लोक  1.198.13-15 
वैशम्पायन उवाच
ततस्तु कृतदारेभ्य: पाण्डुभ्य: प्राहिणोद्धरि:।
वैदूर्यमणिचित्राणि हैमान्याभरणानि च॥ १३॥
वासांसि च महार्हाणि नानादेश्यानि माधव:।
कम्बलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च॥ १४॥
शयनासनयानानि विविधानि महान्ति च।
वैदूर्यवज्रचित्राणि शतशो भाजनानि च॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं: हे जनमेजय! विवाह के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को वैदूर्य रत्नजड़ित अनेक स्वर्ण आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र, विभिन्न देशों में निर्मित कोमल कम्बल, मृगचर्म, सुन्दर रत्न, पलंग, चटाइयाँ, नाना प्रकार के विशाल वाहन तथा वैदूर्य एवं वज्रमणि (हीरे) जड़ित सैकड़ों पात्र उपहार स्वरूप भेजे।
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! After the marriage was over, Lord Krishna sent many gold ornaments studded with vaidurya gems, precious clothes, soft-touch blankets made in various countries, deerskin, beautiful gems, beds, mats, large vehicles of various kinds and hundreds of vessels studded with vaidurya and vajramani (diamonds) as gifts to the Pandavas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)