श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 197: द्रौपदीका पाँचों पाण्डवोंके साथ विवाह  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.197.2 
दिष्टस्य ग्रन्थिरनिवर्तनीय:
स्वकर्मणा विहितं नेह किंचित्।
कृतं निमित्तं हि वरैकहेतो-
स्तदेवेदमुपपन्नं विधानम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भाग्य में जो लिखा है, उसे कोई नहीं बदल सकता। यहाँ अपने प्रयत्नों से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। एक वरदान प्राप्त करने के लिए की गई साधना पाँच पतियों की प्राप्ति का कारण बनी; अतः भाग्य द्वारा पूर्वनिर्धारित विधान का पालन करना ही उचित है॥ 2॥
 
No one can change what is written in one's destiny. Nothing can be achieved here by one's own efforts. The sadhana (penance) done to obtain one boon became the reason for obtaining five husbands; hence it is appropriate to follow the law predetermined by the destiny.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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