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mahabharat 1.196.21: तब पर्वत पर सोये हुए महादेवजी क्रोधित होकर नेत्र फैलाकर वज्रधारी इन्द्र से बोले - 'शतकरातो! तुमने पहले मूर्खतापूर्वक मेरा अपमान किया है, अतः अब इस गुफा में प्रवेश करो॥21॥   |   mahabharat अध्याय 1.196: व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 196: व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.196.21 
ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं
विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच।
दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो
यन्मां बाल्यादवमंस्था: पुरस्तात्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
तब पर्वत पर सोये हुए महादेवजी क्रोधित होकर नेत्र फैलाकर वज्रधारी इन्द्र से बोले - 'शतकरातो! तुमने पहले मूर्खतापूर्वक मेरा अपमान किया है, अतः अब इस गुफा में प्रवेश करो॥21॥
 
Then Mahadevji, who was sleeping on the mountain, became angry with his eyes wide and said to the thunderbolt-wielding Indra - 'Shatkrato! You have foolishly insulted me earlier, so now enter this cave. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)