Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.196.20: उसने उस महान पर्वत की गुफा का द्वार खोला और उसमें अपने ही समान तेजस्वी चार इन्द्रियों को देखा। उन्हें देखकर वह अत्यन्त दुःखी हुआ और सोचने लगा, ‘कहीं मेरी भी ऐसी ही दुर्दशा तो नहीं हो जाएगी?’॥20॥ | mahabharat अध्याय 1.196: व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स तद् विवृत्य विवरं महागिरे-
स्तुल्यद्युतींश्चतुरोऽन्यान् ददर्श।
स तानभिप्रेक्ष्य बभूव दु:खित:
कच्चिन्नाहं भविता वै यथेमे॥ २०॥
अनुवाद
उसने उस महान पर्वत की गुफा का द्वार खोला और उसमें अपने ही समान तेजस्वी चार इन्द्रियों को देखा। उन्हें देखकर वह अत्यन्त दुःखी हुआ और सोचने लगा, ‘कहीं मेरी भी ऐसी ही दुर्दशा तो नहीं हो जाएगी?’॥20॥
He opened the door of the cave in that great mountain and saw the four other senses in it who were as radiant as himself. On seeing them he became very sad and started thinking, 'Is it possible that I too will fall into the same plight as these ones?'॥ 20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥