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mahabharat 1.196.18: तत्पश्चात् उस स्त्री के स्पर्श करते ही इन्द्र के सारे अंग शिथिल हो गए और वह भूमि पर गिर पड़ा। तब भयंकर तेजस्वी भगवान रुद्र ने उससे कहा - 'इन्द्र! अब कभी ऐसा अभिमान मत करना॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.196: व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 196: व्यासजीका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर दिव्य दृष्टि देना और द्रुपदका उनके दिव्य रूपोंकी झाँकी करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.196.18 
तत: शक्र: स्पृष्टमात्रस्तया तु
स्रस्तैरङ्गै: पतितोऽभूद् धरण्याम्।
तमब्रवीद् भगवानुग्रतेजा
मैवं पुन: शक्र कृथा: कथंचित्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उस स्त्री के स्पर्श करते ही इन्द्र के सारे अंग शिथिल हो गए और वह भूमि पर गिर पड़ा। तब भयंकर तेजस्वी भगवान रुद्र ने उससे कहा - 'इन्द्र! अब कभी ऐसा अभिमान मत करना॥18॥
 
Thereafter as soon as that woman touched Indra, all his limbs became weak and he fell on the ground. Then the fierce and radiant Lord Rudra said to him - 'Indra! Never be so proud again.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)