श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 195: व्यासजीके सामने द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने-अपने विचार व्यक्त करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.195.7 
द्रुपद उवाच
अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयो:।
न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
द्रुपद बोले - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरी राय में यह पाप है, क्योंकि यह लोक और वेद दोनों के विरुद्ध है। कहीं भी अनेक पुरुषों द्वारा एक ही पत्नी रखने की प्रथा नहीं है।
 
Drupada said - O best of Brahmins! In my opinion this is a sin because it is against both the world and the Vedas. There is no practice of many men having the same wife anywhere. 7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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