श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 193: पाण्डवों और कुन्तीका द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना और राजा द्रुपदद्वारा पाण्डवोंके शील-स्वभावकी परीक्षा  » 
 
 
अध्याय 193: पाण्डवों और कुन्तीका द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना और राजा द्रुपदद्वारा पाण्डवोंके शील-स्वभावकी परीक्षा
 
श्लोक 1:  दूत ने कहा, "महाराज द्रुपद ने बारातियों के लिए उत्तम भोजन तैयार किया है। अतः आप सब लोग अपने दैनिक कार्य समाप्त करके उसे ग्रहण करें। विवाह-विधि के अनुसार राजकुमारी कृष्णा का भी वहाँ स्वागत करें। इसमें विलम्ब नहीं करना चाहिए।" ॥1॥
 
श्लोक 2:  ये रथ स्वर्ण कमलों से सुशोभित हैं और राजा की सवारी के लिए उपयुक्त हैं। इन्हें उत्तम घोड़ों द्वारा खींचा जाता है। आप सभी इन पर सवार होकर राजा द्रुपद के महल की ओर चलें।
 
श्लोक 3:  वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय! कौरवों के श्रेष्ठ पाण्डव पुरोहित को विदा करके उन विशाल रथों पर सवार होकर (राजमहल की ओर) चले। उस समय कुन्ती और कृष्ण एक ही रथ पर साथ-साथ बैठे थे।
 
श्लोक 4:  उस समय पुरोहित के मुख से धर्मराज युधिष्ठिर की कही हुई बात सुनकर राजा द्रुपद ने उन महारथियों के शील की परीक्षा करने के लिए अनेक प्रकार की वस्तुएँ एकत्रित कीं॥4॥
 
श्लोक 5-6:  हे राजन! वहाँ (सभी प्रकार के) फल, सुन्दर मालाएँ, कवच, ढाल, चटाई, गौएँ, रस्सियाँ, बीज तथा अन्य कृषि उपकरण और शिल्पकला की वस्तुएँ पूर्णतः संग्रहित थीं। इसके अतिरिक्त, राजा द्रुपद ने खेलों के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ भी वहाँ एकत्रित की थीं।
 
श्लोक 7-8:  दूसरी ओर कवच, चमकती ढालें, तलवारें, विशाल एवं विचित्र घोड़े और रथ, उत्तम धनुष, विचित्र बाण, स्वर्ण-जटित भाले और बाण, भाले, भुशुण्ड, कुल्हाड़ी तथा सभी प्रकार के युद्ध उपकरण, उत्तम पदार्थों से बने हुए बिस्तर और चटाइयाँ तथा नाना प्रकार के वस्त्र भी वहाँ रखे हुए थे।
 
श्लोक 9:  कुंती देवी सतीत्वनिष्ठ कृष्ण के साथ द्रुपद के महल में गईं। वहाँ की उदार स्त्रियों ने कौरवराज पाण्डु की पत्नी का बड़े आदरपूर्वक स्वागत किया।
 
श्लोक 10-11:  महाराज! पाण्डवों की चाल सिंह के समान वीरतापूर्ण थी, उनकी आँखें बैल के समान बड़ी-बड़ी थीं, उन्होंने काले मृगचर्म के दुपट्टे ओढ़ रखे थे, उनकी कंठमालाएँ मांस से छिपी हुई थीं और उनकी भुजाएँ सर्पराज के शरीर के समान मोटी और विशाल थीं। उन सिंहरूपी पाण्डवों को देखकर राजा द्रुपद, उनके सभी पुत्र, मंत्री, इष्ट-मित्र और सभी सेवक अत्यन्त प्रसन्न हुए।
 
श्लोक 12:  पुरुषोत्तम पाण्डव अपने ज्येष्ठों और बालकों के क्रम से वहाँ रखे हुए बहुमूल्य आसनों पर बिना किसी संकोच या लज्जा के, तथा अपने हृदय में लेशमात्र भी आश्चर्य न रखते हुए बैठ गए॥12॥
 
श्लोक 13:  फिर नौकर और रसोइये स्वच्छ और सुंदर वस्त्र पहनकर, राजा के खाने के लिए उपयुक्त सोने और चांदी के बर्तनों में विभिन्न प्रकार के सामान्य और विशेष खाद्य पदार्थ लाए और परोसे।
 
श्लोक 14:  उन सब वस्तुओं को अपनी रुचि के अनुसार खाकर पुरुषोत्तम पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए। हे राजन! वहाँ एकत्रित की हुई अन्य सब भोग-विलास की वस्तुओं को छोड़कर वे वीर योद्धा सबसे पहले उस स्थान पर गए जहाँ युद्ध की सामग्री रखी हुई थी॥ 14॥
 
श्लोक 15:  जनमेजय! यह सब देखकर राजा द्रुपद, राजकुमार और सभी मंत्रीगण बहुत प्रसन्न हुए और उनके पास जाकर उन्होंने मन में निश्चय किया कि ये राजकुमार सचमुच कुन्तीदेवी के पुत्र हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)