श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 187: अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  1.187.19-20 
यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथवक्रै:
राधेयदुर्योधनशल्यशाल्वै:।
तदा धनुर्वेदपरैर्नृसिंहै:
कृतं न सज्यं महतोऽपि यत्नात्॥ १९॥
तदर्जुनो वीर्यवतां सदर्प-
स्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभाव:।
सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण
शरांश्च जग्राह दशार्धसंख्यान्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
रुक्म, सुनीथ, वक्र, कर्ण, दुर्योधन, शल्य और शाल्व आदि धनुर्वेद के निपुण विद्वान् पुरुषसिंह राजा जिस धनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके, उसी धनुष पर विष्णु के समान पराक्रमी और बलवान वीरों में श्रेष्ठता का अभिमान रखने वाले इन्द्रकुमार अर्जुन ने पलक झपकते ही प्रत्यंचा चढ़ा दी। इसके बाद उन्होंने उन पाँचों बाणों को भी हाथ में ले लिया। 19-20॥
 
Rukma, Sunitha, Vakra, Karna, Duryodhana, Shalya and Shalva, etc., the expert scholars of Dhanurveda, Purushasingh Raja, could not string the string on the same bow, on which Indrakumar Arjuna, who had the pride of superiority among the mighty and powerful heroes like Vishnu, strung the string on the same bow in the blink of an eye. After this he also took those five arrows in his hand. 19-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)