श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 186: राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना  »  श्लोक d5-d6h
 
 
श्लोक  1.186.d5-d6h 
(ततो वरिष्ठ: सुरदानवाना-
मुदारधीर्वृष्णिकुलप्रवीर:।
जहर्ष रामेण स पीडॺ हस्तं
हस्तं गतां पाण्डुसुतस्य मत्वा॥
न जज्ञुरन्ये नृपवीरमुख्या:
संछन्नरूपानथ पाण्डुपुत्रान्।)
 
 
अनुवाद
यह देखकर देवताओं और दानवों द्वारा सम्मानित, वृष्णिवंश के प्रमुख वीर एवं दानवीर भगवान श्रीकृष्ण ने बल-रामजी सहित उसका हाथ दबाया और अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें विश्वास हो गया कि द्रौपदी अब पांडवपुत्र अर्जुन के हाथों में है। पांडवों ने अपनी पहचान छिपा रखी थी, इसलिए कोई अन्य राजा या प्रमुख वीर उन्हें पहचान नहीं सका।
 
Seeing this, respected by the gods and demons, the chief brave and generous Lord Shri Krishna of the Vrishni clan, along with Bal-Ramji, pressed her hand and became very happy. He was sure that Draupadi was now in the hands of Pandava's son Arjun. The Pandavas had concealed their identity, so no other king or chief brave could identify them.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि राजपराङ्मुखीभवने षडशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें सम्पूर्ण राजाओंके विमुख होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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