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श्लोक 1.181.3  |
अधर्मिष्ठं वसिष्ठेन कृतं चापि पुरा सखे।
एतन्मे संशयं सर्वं छेत्तुमर्हसि पृच्छत:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| हे मित्र! महर्षि वसिष्ठ ने पूर्वकाल में जो पापकर्म किया था, उसका कारण क्या है? यही मेरा संदेह है, जो मैं पूछ रहा हूँ। कृपया मेरे इन सभी संदेहों का निवारण करें॥3॥ |
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| Friend! What is the reason behind the sinful act committed by Maharishi Vasishtha in the past? This is my doubt which I am asking. Please clear all these doubts of mine.॥ 3॥ |
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