श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 181: राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.181.3 
अधर्मिष्ठं वसिष्ठेन कृतं चापि पुरा सखे।
एतन्मे संशयं सर्वं छेत्तुमर्हसि पृच्छत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे मित्र! महर्षि वसिष्ठ ने पूर्वकाल में जो पापकर्म किया था, उसका कारण क्या है? यही मेरा संदेह है, जो मैं पूछ रहा हूँ। कृपया मेरे इन सभी संदेहों का निवारण करें॥3॥
 
Friend! What is the reason behind the sinful act committed by Maharishi Vasishtha in the past? This is my doubt which I am asking. Please clear all these doubts of mine.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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