श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 181: राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.181.13 
अप्रमत्त: स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रत:।
शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'तुम सदैव धर्म में तत्पर रहते हो, बिना किसी प्रमाद के। तुम सदैव अपने गुरुजनों की सेवा में तत्पर रहते हो। हे वीर! यद्यपि इस समय तुम शाप से पीड़ित हो, फिर भी तुम्हें कोई पाप कर्म नहीं करना चाहिए।॥13॥
 
‘You are always steadfast in Dharma without any negligence. You are always engaged in the service of your Gurus. O brave warrior! Although you are suffering from a curse at this time, you should not commit any sinful act.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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