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श्लोक 1.180.23  |
स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च।
भक्षयन् दृश्यते वह्नि: सदा पर्वणि पर्वणि॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| वह अग्नि आज भी हर त्यौहार के अवसर पर राक्षसों, पेड़ों और पत्थरों को जलाती हुई दिखाई देती है। |
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| That fire is still seen there burning demons, trees and stones on every festival occasion. 23. |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्वोपाख्याने अशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वोपाख्यानविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८०॥
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