श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 180: पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.180.16 
न हि तं राक्षस: कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने।
आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाभवत्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘मुनि! उसे कोई राक्षस खा नहीं सकता था। अपने ही शाप (राजा को नरभक्षी राक्षस बना देने) के कारण उसे उसी समय अपनी मृत्यु देखनी पड़ी॥16॥
 
‘Muni! No demon could eat him. Due to his own curse (of turning the king into a cannibal demon) he had to see his death at that time.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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