श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 179: और्व और पितरोंकी बातचीत तथा और्वका अपनी क्रोधाग्निको बडवानलरूपसे समुद्रमें त्यागना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.179.14 
ममापि चेद् भवेदेवमीश्वरस्य सतो महत्।
उपेक्षमाणस्य पुनर्लोकानां किल्बिषाद् भयम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं शक्ति होते हुए भी चुपचाप उदासीन भाव से लोगों के महान पापों को देखता रहूँ, तो मुझे भी उनके पापों से भय हो सकता है ॥14॥
 
If I, despite having the strength, silently observe people's great sins with an indifferent attitude, then I too might be afraid of their sins. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)