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अध्याय 178: पितरोंद्वारा और्वके क्रोधका निवारण
 
श्लोक 1:  ब्राह्मणी बोली, "पुत्रो! मैंने तुम्हारा दर्शन नहीं लिया है; मैं तुम पर क्रोधित भी नहीं हूँ। किन्तु मेरी जांघ से उत्पन्न यह भृगुवंशी बालक आज अवश्य ही तुम पर क्रोधित है।"
 
श्लोक 2:  हे पुत्रो! यह तो स्पष्ट है कि इस महाबली बालक ने तुम्हारे द्वारा मारे गए अपने स्वजनों को स्मरण करके क्रोधवश तुम्हारे नेत्र छीन लिए हैं; इसमें संशय नहीं है॥2॥
 
श्लोक 3:  हे बच्चों! जब से तुम सबने भृगुवंश के गर्भस्थ बालकों को मारना आरम्भ किया है, तब से मैंने अपने इस भ्रूण को सौ वर्षों तक अपनी एक जाँघ में छिपाकर रखा था।
 
श्लोक 4:  भृगु वंश को पुनः प्रचलित करने की इच्छा से इस बालक ने गर्भ में ही छहों अंगों सहित समस्त वेदों को प्राप्त कर लिया ॥4॥
 
श्लोक 5:  अतः यह बालक अपने पिता की हत्या से क्रोधित होकर निश्चय ही तुम्हें मारना चाहता है। उसी के दिव्य तेज के कारण तुम्हारी दृष्टि चली गई है॥5॥
 
श्लोक 6:  अतः तुम मेरे श्रेष्ठ पुत्र और्व की स्तुति करो। तुम्हारे प्रणाम से संतुष्ट होकर वह तुम्हारी खोई हुई आँखों की ज्योति लौटा देगा।
 
श्लोक 7:  वसिष्ठजी कहते हैं - पराशर! ब्राह्मणी की यह बात सुनकर उन सभी क्षत्रियों ने (प्रणाम करके) और्व से कहा - ‘आप प्रसन्न हो जाइए।’ तब (उनके विनम्र वचन सुनकर) और्व प्रसन्न हो गए और (अपनी तपस्या के प्रभाव से) उन्हें नेत्रों की ज्योति प्रदान की।
 
श्लोक 8:  वह महान ब्रह्मर्षि अपनी माता की जंघा को छेदकर उत्पन्न हुआ था, इसलिए वह संसार में 'और्व' नाम से विख्यात हुआ।
 
श्लोक 9:  तत्पश्चात् वे क्षत्रिय अपने खोए हुए नेत्रों को पुनः प्राप्त करके लौट आए; इधर भृगुवंशी और ऋषि ने सम्पूर्ण जगत् की पराजय का विचार किया॥9॥
 
श्लोक 10:  वत्स पराशर! उन महामुनि ने सम्पूर्ण लोकों के विनाश का मन बना लिया ॥10॥
 
श्लोक 11:  भृगुवंश को आनन्द प्रदान करने वाले उस भृगुपुत्र ने अपने पूर्वजों (जो क्षत्रियों द्वारा मारे गए थे) के सम्मान के लिए अथवा उनके वध का बदला लेने के लिए सम्पूर्ण लोकों का विनाश करने का निश्चय किया और महान तप द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाई ॥11॥
 
श्लोक 12:  अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने अत्यंत घोर तपस्या द्वारा देवताओं, दानवों और मनुष्यों सहित समस्त लोकों को कष्ट पहुँचाया ॥12॥
 
श्लोक 13:  तत्पश्चात्, अपने वंश के सुख के कारण और्व मुनि का यह निश्चय जानकर समस्त पितर पितृलोक से आये और उन्होंने यह बात कही ॥13॥
 
श्लोक 14:  पितरों ने कहा—बेटा और्व! हमने तुम्हारे घोर तप का प्रभाव देख लिया है। अब तुम अपना क्रोध त्याग दो और समस्त लोकों पर प्रसन्न हो जाओ॥ 14॥
 
श्लोक 15:  पिताजी, आप यह मत सोचिए कि जब क्षत्रिय हमारे विरुद्ध हिंसा कर रहे थे, तब हम भृगुवंशी ब्राह्मण शुद्ध अंतःकरण वाले होकर अपनी असमर्थता के कारण अपने कुल का संहार चुपचाप सहन करते रहे।
 
श्लोक 16:  हे पुत्र! जब हमारी आयु बहुत अधिक हो गई (तब भी मृत्यु नहीं आई थी) तब उस अवस्था में हम बहुत दुःखी हुए और हमने (जानकर) क्षत्रियों के द्वारा अपने को मरवाने की इच्छा की॥ 16॥
 
श्लोक 17:  एक भृगुवंशी ने अपने घर में जो धन गड़ा रखा था, वह भी शत्रुता बढ़ाने के लिए ही किया था। हम चाहते थे कि क्षत्रिय हमसे रुष्ट हो जाएँ॥17॥
 
श्लोक 18:  द्विजश्रेष्ठ! (यदि ऐसा न हुआ होता) तो हम स्वर्ग की इच्छा रखने वाले भक्तों को धन से क्या प्रयोजन था; क्योंकि कुबेर ने तो हमारे लिए प्रचुर धन ला दिया था॥18॥
 
श्लोक 19:  पिता जी! जब मृत्यु हमें अपनी गोद में नहीं ले जा सकी, तब हमने एकमत होकर यह उपाय निकाला।
 
श्लोक 20:  बेटा! आत्महत्या करने वाले को शुभ लोक की प्राप्ति नहीं होती, इसीलिए भली-भाँति विचार करके मैंने अपने हाथों से आत्म-हत्या नहीं की।
 
श्लोक 21:  बेटा! तुम जो कुछ करना चाहते हो, वह भी हमें प्रिय नहीं है। समस्त लोकों का विनाश करना महान पाप है, इसलिए अपने मन को ऐसा करने से रोको।
 
श्लोक 22:  पितामह! क्षत्रियों का संहार मत करो। पुत्र! पृथ्वी सहित सातों लोकों का विनाश मत करो। यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, यह तुम्हारे तप से उत्पन्न तेज को कलंकित करने वाला है, अतः इसे मार डालो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)