Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.175.49: लेकिन समुद्र की लहरों के वेग से महर्षि किनारे पर आ गिरे। कठोर व्रत धारण किए हुए ऋषि वशिष्ठ जब किसी भी प्रकार प्राण त्याग नहीं सके, तो निराश होकर अपने आश्रम लौट आए। | mahabharat अध्याय 1.175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स समुद्रोर्मिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनि:।
न ममार यदा विप्र: कथंचित् संशितव्रत:।
जगाम स तत: खिन्न: पुनरेवाश्रमं प्रति॥ ४९॥
अनुवाद
लेकिन समुद्र की लहरों के वेग से महर्षि किनारे पर आ गिरे। कठोर व्रत धारण किए हुए ऋषि वशिष्ठ जब किसी भी प्रकार प्राण त्याग नहीं सके, तो निराश होकर अपने आश्रम लौट आए।
But the force of the sea waves washed the great sages to the shore. When the sage Vasishtha, who was observing a strict vow, could not die in any way, he returned to his hermitage in despair.
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे वसिष्ठशोके पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १७५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठचरित्रके प्रसंगमें वसिष्ठशोकविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥