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श्लोक 1.175.45  |
स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषि:।
गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवापतत्॥ ४५॥ |
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| अनुवाद |
| महर्षि वसिष्ठ ने मेरु पर्वत की चोटी से उसी पर्वत की एक चट्टान पर अपने को फेंका; परन्तु ऐसा लगा मानो वे रुई के ढेर पर गिर पड़े हों ॥ 45॥ |
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| The great sage Vasishtha threw himself from the peak of Mount Meru onto a rock on the same mountain; but it felt as if he had fallen on a heap of cotton. ॥ 45॥ |
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