श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.175.42 
स ताञ्छक्त्यवरान् पुत्रान् वसिष्ठस्य महात्मन:।
भक्षयामास संक्रुद्ध: सिंह: क्षुद्रमृगानिव॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जैसे सिंह क्रोध में आकर छोटे-छोटे मृगों को खा जाता है, उसी प्रकार उस राजा ने (राक्षसों की सभा में) महात्मा वसिष्ठ के उन सब पुत्रों को खा लिया, जो शक्ति से भी छोटे थे।
 
Just as a lion in anger devours small deer, similarly that king (in the assembly of demons) ate all the sons of the great soul Vasishtha who were younger than Shakti.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas