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श्लोक 1.175.37  |
द्विरनुव्याहृते राज्ञ: स शापो बलवानभूत्।
रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवन्नृप:॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| राजा के ऐसा दो बार कहने से उस पर शाप और भी प्रबल हो गया। साथ ही राक्षस की शक्ति भी उसमें सम्मिलित हो गई और राजा की विवेक शक्ति सर्वथा नष्ट हो गई ॥37॥ |
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| The curse on the king became stronger because he said this twice. Along with that, the power of the demon got added to him and the king's discretion power got completely lost. ॥ 37॥ |
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