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श्लोक 1.175.25  |
तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा।
आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| तब राजर्षि मित्रसाह (कल्मषपाद) ने उस द्विज से कहा - 'ब्रह्मन्! तुम यहाँ बैठकर दो घड़ी तक प्रतीक्षा करो ॥25॥ |
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| Then Rajarshi Mitrasah (Kalmashpad) said to that Dwija – 'Brahman! You sit here and wait for two hours. 25॥ |
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