श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.175.25 
तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा।
आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तब राजर्षि मित्रसाह (कल्मषपाद) ने उस द्विज से कहा - 'ब्रह्मन्! तुम यहाँ बैठकर दो घड़ी तक प्रतीक्षा करो ॥25॥
 
Then Rajarshi Mitrasah (Kalmashpad) said to that Dwija – 'Brahman! You sit here and wait for two hours. 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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