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श्लोक 1.175.13-14  |
हंसि राक्षसवद् यस्माद् राजापसद तापसम्।
तस्मात् त्वमद्यप्रभृति पुरुषादो भविष्यसि॥ १३॥
मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम्।
गच्छ राजाधमेत्युक्त: शक्तिना वीर्यशक्तिना॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| तप की प्रबल शक्ति से संपन्न शक्ति मुनि बोले - 'कल्माषपाद राजाओं में अधम है ! तू राक्षस के समान तपस्वी ब्राह्मण का वध कर रहा है, अतः आज से तू नरभक्षी राक्षस हो जाएगा और अब से इस पृथ्वी पर मनुष्य-मांस का मोह करके विचरण करेगा । नृपधाम ! यहाँ से चले जा ॥' ॥13-14॥ |
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| Shakti Muni, endowed with the powerful power of penance, said – 'Kalmashapada is the wretched among the kings! You are killing an ascetic Brahmin like a demon, hence from today onwards you will become a cannibalistic demon and from now on you will roam on this earth addicted to human flesh. Nripadham! Get out from here'. 13-14॥ |
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