श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 174: वसिष्ठजीके अद्‍भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.174.13 
सामात्य: सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा।
षडुन्नतां सुपार्श्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
उस समय वह, उसकी सेना और मन्त्री बहुत प्रसन्न हुए । ऋषि की गाय के छह अंग बड़े और विशाल थे - सिर, गर्दन, जांघें, कंठ, पूंछ और थन । उसके पार्श्व और जांघें बहुत सुंदर थीं । वह पाँच चौड़े अंगों से सुशोभित थी ॥2॥13॥
 
At that time, he and his army and ministers were very pleased. The six parts of the sage's cow were large and spacious - head, neck, thighs, neck-cloth, tail and udder. 1 Its sides and thighs were very beautiful. It was adorned with five broad limbs. 2 ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)