श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 173: गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.173.1 
वैशम्पायन उवाच
स गन्धर्ववच: श्रुत्वा तत् तदा भरतर्षभ।
अर्जुन: परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ जनमेजय! गन्धर्व का यह कथन सुनकर अर्जुन अपनी अपार भक्ति के कारण पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभायमान हो गया॥1॥
 
Vaishampayanji says – Bharatshreshtha Janamejaya! Hearing this statement of Gandharva, Arjun became as beautiful as the full moon due to his immense devotion. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)