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mahabharat 1.172.27-28: वसिष्ठ ऋषि ने उस कन्या को स्वीकार कर लिया और वहाँ से विदा लेकर वे तपती के साथ पुनः उस स्थान पर आये, जहाँ कुरुवंश में श्रेष्ठ यशस्वी राजा संवरण काम के वशीभूत होकर मन में तपती का चिन्तन करते हुए बैठे थे।   |   mahabharat अध्याय 1.172: वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 172: वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  1.172.27-28 
प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्षिस्तपतीं तदा।
वसिष्ठोऽथ विसृष्टस्तु पुनरेवाजगाम ह॥ २७॥
यत्र विख्यातकीर्ति: स कुरूणामृषभोऽभवत्।
स राजा मन्मथाविष्टस्तद्‍गतेनान्तरात्मना॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वसिष्ठ ऋषि ने उस कन्या को स्वीकार कर लिया और वहाँ से विदा लेकर वे तपती के साथ पुनः उस स्थान पर आये, जहाँ कुरुवंश में श्रेष्ठ यशस्वी राजा संवरण काम के वशीभूत होकर मन में तपती का चिन्तन करते हुए बैठे थे।
 
The sage Vasishtha accepted the girl and after taking leave from there he again came with Tapati to the place where the renowned king Samvarana, the best of the Kuru dynasty, was sitting under the influence of lust, thinking about Tapati in his mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)