श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 17: मेरुपर्वतपर अमृतके लिये विचार करनेवाले देवताओंको भगवान् नारायणका समुद्रमन्थनके लिये आदेश  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  1.17.5-6 
सौतिरुवाच
ज्वलन्तमचलं मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम्।
आक्षिपन्तं प्रभां भानो: स्वशृङ्गै: काञ्चनोज्ज्वलै:॥ ५॥
कनकाभरणं चित्रं देवगन्धर्वसेवितम्।
अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मबहुलैर्जनै:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी बोले - शौनकजी! वहाँ मेरु नाम का एक प्रसिद्ध पर्वत है, जो अपनी प्रभा से सदैव चमकता रहता है। वह महान् कांति-पुंज है और अत्यंत उत्कृष्ट है। अपनी अत्यंत उज्ज्वल स्वर्णिम चोटियों के कारण वह सूर्यदेव की प्रभा को भी तुच्छ जान पड़ता है। उस सुवर्ण से विभूषित विचित्र शिला पर देवता और गंधर्व निवास करते हैं। उसका कोई माप नहीं है। जो लोग बहुत पाप करते हैं, वे वहाँ पैर नहीं रख सकते।
 
Ugrashravaji said - Shaunakji! There is a famous mountain named Meru, which keeps on glowing with its radiance. It is a great mass of radiance and is extremely excellent. With its extremely bright golden peaks, it even makes the radiance of the Sun God look insignificant. Gods and Gandharvas reside on that strange rock decorated with gold. There is no measurement of it. People who have a lot of sins cannot set foot there. 5-6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)