|
| |
| |
श्लोक 1.167.4  |
यानीह रमणीयानि वनान्युपवनानि च।
सर्वाणि तानि दृष्टानि पुन: पुनररिंदम॥ ४॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे शत्रुओं का नाश करने वाले! यहाँ के सब सुन्दर वन और उद्यान हमने बार-बार देखे हैं॥4॥ |
| |
| O destroyer of enemies! We have seen all the beautiful forests and gardens here again and again. ॥ 4॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|