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mahabharat 1.165.4: मुनिवर भारद्वाज ने बाल्यकाल से ही दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्य का पालन किया था। घृताची में मन लगने के कारण उनका वीर्य स्खलित हो गया। महर्षि ने उस वीर्य को द्रोण (पवित्र पात्र) में रख दिया। 4॥   |   mahabharat अध्याय 1.165: द्रोणके द्वारा द्रुपदके अपमानित होनेका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 165: द्रोणके द्वारा द्रुपदके अपमानित होनेका वृत्तान्त  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.165.4 
तस्यां संसक्तमनस: कौमारब्रह्मचारिण:।
चिरस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मुनिवर भारद्वाज ने बाल्यकाल से ही दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्य का पालन किया था। घृताची में मन लगने के कारण उनका वीर्य स्खलित हो गया। महर्षि ने उस वीर्य को द्रोण (पवित्र पात्र) में रख दिया। 4॥
 
Munivar Bhardwaj had followed celibacy for a long time since his childhood. Due to his mind getting attached to Ghritachi, his semen got ejaculated. Maharishi kept that semen in Drona (sacred pot). 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)