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श्लोक 1.16.22-23  |
एवं शप्त्वा तत: पुत्रो विनतामन्तरिक्षग:॥ २२॥
अरुणो दृश्यते ब्रह्मन् प्रभातसमये सदा।
आदित्यरथमध्यास्ते सारथ्यं समकल्पयत्॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार विनता को शाप देकर बालक अरुण अंतरिक्ष में उड़ गया। ब्रह्मन्! तब से प्रातःकाल (पूर्व दिशा में) जो लालिमा सदैव दिखाई देती है, वह विनतापुत्र अरुण का ही स्वरूप है। वह सूर्यदेव के रथ पर बैठकर उनके सारथी का कार्य संभालने लगा। 22-23॥ |
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| Thus, after cursing Vinata, the child Arun flew into space. Brahman! Since then, the redness that is always visible in the morning (in the eastern direction) is the appearance of Vinata's son Arun. He sat on the chariot of Sun God and started handling the work of his charioteer. 22-23॥ |
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