श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.158.5 
इह वा तारयेद् दुर्गादुत वा प्रेत्य भारत।
सर्वथा तारयेत् पुत्र: पुत्र इत्युच्यते बुधै:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'जो पुत्र अपने पिता को इस लोक में कठिन कष्टों से उबारता है अथवा मरणोपरांत परलोक में उनका उद्धार करता है - सब प्रकार से अपने पिता का उद्धार करता है - उसे विद्वान लोग सच्चा पुत्र कहते हैं ॥5॥
 
'The son who helps his father overcome difficult difficulties in this world or uplifts him in the next world after his death - saves his father in every way - he is called a true son by the learned. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)