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mahabharat 1.158.2: तुम दोनों अनाथों की भाँति क्यों दुःखी होकर रो रहे हो? मेरी बात सुनो और जो उचित समझो, वही करो॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 1.158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.158.2 
किमेवं भृशदु:खार्तौ रोरूयेतामनाथवत्।
ममापि श्रूयतां वाक्यं श्रुत्वा च क्रियतां क्षमम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
तुम दोनों अनाथों की भाँति क्यों दुःखी होकर रो रहे हो? मेरी बात सुनो और जो उचित समझो, वही करो॥ 2॥
 
‘Why are you both so distressed and crying like orphans? Listen to me and do what seems right after hearing it.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)