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mahabharat 1.158.16-17: 'पिताजी! आपको इस बात का निश्चय करने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए कि मुझे शीघ्र त्यागकर इस कुल की रक्षा करनी चाहिए। हमारे लिए इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है कि आपके जाने के बाद हमें कुत्तों की तरह दूसरों से भोजन माँगते फिरना पड़े। यदि आप मुझे त्यागकर अपने बंधु-बाँधवों सहित इस दुःख से मुक्त होकर स्वस्थ रहें, तो हम अमरलोक में रहकर अत्यंत सुखी रहेंगे।'   |   mahabharat अध्याय 1.158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  1.158.16-17 
अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोऽत्यगादयम्।
किं त्वत: परमं दु:खं यद् वयं स्वर्गते त्वयि॥ १६॥
याचमाना: परादन्नं परिधावेमहि श्ववत्।
त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात् सबान्धवे।
अमृते वसती लोके भविष्यामि सुखान्विता॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! आपको इस बात का निश्चय करने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए कि मुझे शीघ्र त्यागकर इस कुल की रक्षा करनी चाहिए। हमारे लिए इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है कि आपके जाने के बाद हमें कुत्तों की तरह दूसरों से भोजन माँगते फिरना पड़े। यदि आप मुझे त्यागकर अपने बंधु-बाँधवों सहित इस दुःख से मुक्त होकर स्वस्थ रहें, तो हम अमरलोक में रहकर अत्यंत सुखी रहेंगे।'
 
‘Father! You should not waste your time in deciding the work that must be done (you should abandon me soon and protect this family). What could be a greater sorrow for us than that after you have passed away, we have to run around like dogs begging for food from others. If you abandon me and remain free from this suffering along with your brothers and relatives and remain healthy, then I will be very happy living in the immortal world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)