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mahabharat 1.157.38: वैशम्पायनजी कहते हैं - भरत! उस ब्राह्मणी की यह बात सुनकर उसके पति ब्राह्मणदेव अत्यन्त दुःखी हो गये और उसे गले लगाकर उसके साथ आँसू बहाने लगे।   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.157.38 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तया भर्ता तां समालिङ्गॺ भारत।
मुमोच बाष्पं शनकै: सभार्यो भृशदु:खित:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरत! उस ब्राह्मणी की यह बात सुनकर उसके पति ब्राह्मणदेव अत्यन्त दुःखी हो गये और उसे गले लगाकर उसके साथ आँसू बहाने लगे।
 
Vaishmpayana says: Bhaarat! On hearing the Brahmin lady say this, her husband, the Brahmin God, became very sad and embraced her and started shedding tears along with her.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणीवाक्ये सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणीवाक्यविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५७॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)