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mahabharat 1.157.26: सुयोग्य सन्तान, धन, प्रिय, मित्र और स्त्री - ये सब विपत्तियों से मुक्ति पाने के लिए ही वांछनीय हैं; ऐसा पुण्यात्मा पुरुषों का मत है ॥26॥   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.157.26 
इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृद: प्रिया:।
आपद्धर्मप्रमोक्षाय भार्या चापि सतां मतम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
सुयोग्य सन्तान, धन, प्रिय, मित्र और स्त्री - ये सब विपत्तियों से मुक्ति पाने के लिए ही वांछनीय हैं; ऐसा पुण्यात्मा पुरुषों का मत है ॥26॥
 
Favorable children, wealth, beloved, friend and wife - all these are desirable only to be free from adversities; this is the opinion of virtuous men.॥26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)