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mahabharat 1.150.6: अपने मार्ग में आने वाली जल की धारा को, जिसकी चौड़ाई दूर-दूर तक फैली हुई थी, दोनों भुजाओं के बेड़े के सहारे बार-बार पार करके, दुर्योधन के भय से सभी पाण्डव किसी गुप्त स्थान पर जाकर रहने लगते थे।   |   mahabharat अध्याय 1.150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.150.6 
असकृच्चापि संतीर्य दूरपारं भुजप्लवै:।
पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात् तदा॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अपने मार्ग में आने वाली जल की धारा को, जिसकी चौड़ाई दूर-दूर तक फैली हुई थी, दोनों भुजाओं के बेड़े के सहारे बार-बार पार करके, दुर्योधन के भय से सभी पाण्डव किसी गुप्त स्थान पर जाकर रहने लगते थे।
 
After repeatedly crossing the stream of water that came in their way, whose width was spread far and wide, using the raft of both the arms, all the Pandavas used to go and live in some secret place out of fear of Duryodhana. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)