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mahabharat 1.150.4: जैसे साठ वर्ष का वृद्ध बलवान हाथी, जिसके तीनों अंग गर्व से भरे हुए हों, किसी कारणवश कुपित होकर वन के बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़ने लगता है, उसी प्रकार महाबली भीमसेन उस वन के विशाल वृक्षों को तोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 1.150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.150.4 
स रोषित इव क्रुद्धो वने भञ्जन् महाद्रुमान्।
त्रिप्रस्रुतमद: शुष्मी षष्टिवर्षी मतङ्गराट्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जैसे साठ वर्ष का वृद्ध बलवान हाथी, जिसके तीनों अंग गर्व से भरे हुए हों, किसी कारणवश कुपित होकर वन के बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़ने लगता है, उसी प्रकार महाबली भीमसेन उस वन के विशाल वृक्षों को तोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे।
 
Just as a sixty-year-old strong elephant, whose three limbs are filled with pride, becomes enraged (due to some reason) and starts breaking the big trees of the forest, in the same way the mighty Bhimasena was advancing, breaking down the huge trees of that forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)