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mahabharat 1.150.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीमसेन जब चल रहे थे, तब उनके तेज वेग से वृक्षों और शाखाओं सहित सारा वन घूमता हुआ प्रतीत हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 1.150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 150: माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.150.1 
वैशम्पायन उवाच
तेन विक्रममाणेन ऊरुवेगसमीरितम्।
वनं सवृक्षविटपं व्याघूर्णितमिवाभवत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीमसेन जब चल रहे थे, तब उनके तेज वेग से वृक्षों और शाखाओं सहित सारा वन घूमता हुआ प्रतीत हो रहा था।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! When Bhimasena was walking, the entire forest, including its trees and branches, seemed to be rotating due to his great speed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)