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mahabharat 1.147.5-6: महाराज! तत्पश्चात् एक रात्रि में कुन्ती ने ब्राह्मणों को भिक्षा देने के लिए भोजन कराया। उसमें बहुत सी स्त्रियाँ भी आई थीं। भरत! वे सभी स्त्रियाँ इच्छानुसार घूम-घूमकर और खा-पीकर कुन्तीदेवी से अनुमति लेकर रात्रि में अपने-अपने घर लौट गईं।   |   mahabharat अध्याय 1.147: लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 147: लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  1.147.5-6 
अथ दानापदेशेन कुन्ती ब्राह्मणभोजनम्।
चक्रे निशि महाराज आजग्मुस्तत्र योषित:॥ ५॥
ता विहृत्य यथाकामं भुक्त्वा पीत्वा च भारत।
जग्मुर्निशि गृहानेव समनुज्ञाप्य माधवीम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! तत्पश्चात् एक रात्रि में कुन्ती ने ब्राह्मणों को भिक्षा देने के लिए भोजन कराया। उसमें बहुत सी स्त्रियाँ भी आई थीं। भरत! वे सभी स्त्रियाँ इच्छानुसार घूम-घूमकर और खा-पीकर कुन्तीदेवी से अनुमति लेकर रात्रि में अपने-अपने घर लौट गईं।
 
Maharaj! Thereafter one night Kunti arranged a meal for Brahmins to give alms. Many women had also come to it. Bhaarat! All those women after roaming around as per their wish and eating and drinking, took permission from Kuntidevi and returned to their respective homes in the night. 5-6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)