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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 147: लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.147.17 
वैशम्पायन उवाच
एवं ते विलपन्ति स्म वारणावतका जना:।
परिवार्य गृहं तच्च तस्थू रात्रौ समन्तत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! वारणावत के लोग इस प्रकार विलाप करने लगे। वे सारी रात उस घर को घेरे खड़े रहे।
 
Vaishampayana says, 'O Janamejaya! The people of Varanavat started lamenting in this manner. They stood all night surrounding that house.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)