श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 147: लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.147.1-2 
वैशम्पायन उवाच
तांस्तु दृष्ट्वा सुमनस: परिसंवत्सरोषितान्।
विश्वस्तानिव संलक्ष्य हर्षं चक्रे पुरोचन:॥ १॥
पुरोचने तथा हृष्टे कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिर:।
भीमसेनार्जुनौ चोभौ यमौ प्रोवाच धर्मवित्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पाण्डवों को वहाँ एक वर्ष तक सुखपूर्वक और निश्चिंत होकर रहते देखकर पुरोचन को बड़ी प्रसन्नता हुई। इस प्रकार प्रसन्न होने पर धर्मज्ञ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव से इस प्रकार कहा -॥1-2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Purochana was very happy to see the Pandavas living there happily and confidently for a year. When he became happy in this way, Kuntinandan Yudhishthir, an expert in religion, said to Bhimsen, Arjun, Nakul and Sahadeva thus -॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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