श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 146: विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  1.146.7-8 
उवाच तं सत्यधृति: कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।
अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै॥ ७॥
शुचिमाप्तं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम्।
न विद्यते कवे: किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
तब सत्यवादी कुन्तीकुमार युधिष्ठिर ने उनसे कहा- 'सौम्य! मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुम विदुरजी के हितैषी, सत्यनिष्ठ, विश्वासपात्र, प्रिय और सदैव उनके प्रति अटूट भक्ति रखने वाले हो। हमारा ऐसा कोई प्रयोजन नहीं है, जो परम ज्ञानी विदुरजी को ज्ञात न हो।' 7-8।
 
Then the truthful Kuntikumar Yudhishthira said to him- 'Soumya! I recognize you. You are a well-wisher of Vidurji, honest, trustworthy, dear and always have unwavering devotion towards him. We do not have any such purpose which is not known to the most knowledgeable Vidurji. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)