श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 146: विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.146.1 
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य सुहृत् कश्चित् खनक: कुशलो नर:।
विविक्ते पाण्डवान् राजन्निदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! एक सुरंग खोदनेवाला विदुरजी का शुभचिंतक और विश्वासपात्र था। वह अपने कार्य में बड़ा चतुर था। एक दिन वह पाण्डवों से एकान्त में मिला और यह कहा-॥1॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! A tunnel-digger was a well-wisher and confidant of Vidurji. He was very clever in his work. One day he met the Pandavas in solitude and said this-॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)