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mahabharat 1.145.30: इसके अतिरिक्त, आओ, हम आज से ही भूमि में एक सुरंग खोदें, जो ऊपर से अच्छी तरह ढकी हुई हो। हमारी साँसें भी उसमें छिपी रहेंगी (फिर हमारे कर्मों का क्या होगा)। एक बार हम उस सुरंग में प्रवेश कर जाएँ, तो अग्नि हमें जला नहीं सकेगी ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 1.145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 145: वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.145.30 
भौमं च बिलमद्यैव करवाम सुसंवृतम्।
गूढश्वासान्न नस्तत्र हुताश: सम्प्रधक्ष्यति॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त, आओ, हम आज से ही भूमि में एक सुरंग खोदें, जो ऊपर से अच्छी तरह ढकी हुई हो। हमारी साँसें भी उसमें छिपी रहेंगी (फिर हमारे कर्मों का क्या होगा)। एक बार हम उस सुरंग में प्रवेश कर जाएँ, तो अग्नि हमें जला नहीं सकेगी ॥30॥
 
Apart from this, let us dig a tunnel in the ground from today itself, which is well covered from above. Even our breath will remain hidden there (then what about our actions). Once we enter that tunnel, fire will not be able to burn us. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)